UGC के नए नियमों का बैकग्राउंड और महत्व: उच्च शिक्षा में भेदभाव के खिलाफ एक कदम
रविंद्र साहू, सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा तैयार
उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव और शोषण एक लंबे समय से चली आ रही समस्या है, जो कई युवा प्रतिभाओं की जान ले चुकी है। हाल ही में UGC (University Grants Commission) के नए नियमों को लेकर सवर्ण समुदाय की ओर से सुप्रीम कोर्ट में याचिकाओं का दौर शुरू हो गया है, लेकिन इन नियमों का बैकग्राउंड और उद्देश्य समझना जरूरी है। यह नियम कोई नया क्रिमिनल कानून नहीं हैं, बल्कि सिविल प्रक्रिया पर आधारित हैं, जो सभी वर्गों पर लागू होते हैं और समानता सुनिश्चित करने के लिए बनाए गए हैं। आइए इस मुद्दे को व्यवस्थित तरीके से समझते हैं, जिसमें उच्च शिक्षा में विभिन्न प्रकार के शोषण के आंकड़े भी शामिल हैं।
1. कहानी की शुरुआत: 2019 की याचिका और सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप
कहानी 2019 से शुरू होती है, जब कोलंबिया यूनिवर्सिटी से लॉ में मास्टर्स करने वाली और Columbia Law School Merit Award से सम्मानित दिशा वाडेकर ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की। यह याचिका पायल तड़वी की मां अबेदा तड़वी और रोहित वेमुला की मां राधिका वेमुला की ओर से थी। याचिका में उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव, उत्पीड़न और शोषण के मामलों को उठाया गया था।
प्रक्रिया और सबूत: कोर्ट में गहन विचार-विमर्श हुआ। विभिन्न रिसर्च डेटा प्रस्तुत किए गए, जिसमें IIT, NIT, IIM जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में हो रहे भेदभाव का गहरा विश्लेषण शामिल था। विशेषज्ञों की राय ली गई, और कई यूनिवर्सिटीज के केस स्टडीज पेश किए गए।
सरकारी स्वीकारोक्ति: 2023 में भारत सरकार ने राज्यसभा में बताया कि 2019 से 2021 के बीच 98 SC, ST और OBC छात्रों ने आत्महत्या की। ये आंकड़े मुख्य रूप से IIT, NIT, IIM और IISER जैसे सेंट्रल संस्थानों से थे। इसके अलावा, भेदभाव के मामलों में 118% की वृद्धि दर्ज की गई, जो 2019-2020 में 173 से बढ़कर 2023-2024 में 378 हो गए।
2023 में, कोर्ट ने UGC को निर्देश दिया कि पुराने नियमों को सख्ती से लागू करें और नए रेगुलेशंस तैयार करें। परिणामस्वरूप, जनवरी 2026 में UGC ने "Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026" नोटिफाई किए, जो 2012 के पुराने नियमों को अपडेट करते हैं। हालांकि, 29 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों पर स्टे लगा दिया, क्योंकि इन्हें 'एकतरफा' माना गया (जनरल कैटेगरी को प्रोटेक्शन न देने के कारण)। फिलहाल, 2012 के नियम लागू हैं, और पूर्ण सुनवाई मार्च 2026 में होगी।
2. उच्च शिक्षा में शोषण और भेदभाव के प्रकार: आंकड़ों के साथ
उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव सिर्फ एक सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि एक संस्थागत समस्या है। NCRB (National Crime Records Bureau) और विभिन्न रिपोर्ट्स से पता चलता है कि यह भेदभाव छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है, जिससे आत्महत्या जैसे कदम उठाने की नौबत आ जाती है। यहां कुछ प्रमुख प्रकार और आंकड़े दिए जा रहे हैं:
- जातिगत मौखिक उत्पीड़न (Verbal Abuse): छात्रों को जातिसूचक शब्दों से अपमानित किया जाना आम है। एक अध्ययन के अनुसार, 2019-2023 के बीच समाचार पत्रों में रिपोर्टेड 491 छात्र आत्महत्या मामलों में से 11% (54 केस) हरासमेंट से जुड़े थे, जिसमें जातिगत टिप्पणियां प्रमुख थीं। कई यूनिवर्सिटीज में SC/ST/OBC छात्रों को "आरक्षण वाले" कहकर ताना मारा जाता है।
- धमकी और बुलिंग (Bullying and Ragging): रैगिंग के रूप में जातिगत शोषण होता है। उसी अध्ययन में 2% (10 केस) स्पष्ट रूप से जातिगत भेदभाव से जुड़े थे, और 1.4% (7 केस) बुलिंग से। IITs और NITs में ऐसे मामले बढ़ रहे हैं, जहां सीनियर छात्र जूनियर को जाति के आधार पर टारगेट करते हैं।
- संस्थागत बहिष्कार और पूर्वाग्रह (Institutional Exclusion and Bias): प्रोफेसरों द्वारा ग्रेडिंग में भेदभाव, स्कॉलरशिप में देरी, या लैब एक्सेस से वंचित करना। एक रिपोर्ट के अनुसार, SC/ST छात्रों के ड्रॉपआउट रेट सामान्य से 20-30% अधिक है। 2019-2021 में कुल छात्र आत्महत्याएं 35,950 थीं (2019: 10,335; 2020: 12,526; 2021: 13,089), लेकिन NCRB कास्ट-वाइज डेटा नहीं रखता। फिर भी, सेंट्रल संस्थानों में 98 SC/ST/OBC सुसाइड्स दर्ज हुए, जो संस्थागत शोषण से जुड़े हैं।
- शारीरिक और यौन शोषण (Physical and Sexual Exploitation): दलित छात्राओं पर यौन उत्पीड़न के मामले बढ़े हैं। IDSN रिपोर्ट के अनुसार, शिक्षा में दलितों के खिलाफ एलियनेशन, सोशल एक्सक्लूजन और फिजिकल अब्यूज आम है। HRW रिपोर्ट में सेक्शुअल अब्यूज और पुलिस द्वारा उत्पीड़न का जिक्र है।
- अन्य आंकड़े: 2014-2015 NCRB डेटा (कास्ट-वाइज उपलब्ध अंतिम) से जनरल कैटेगरी में सुसाइड रेट 15/100,000 था, जबकि ST: 10.7, SC: 9.4। लेकिन उच्च शिक्षा में SC/ST/OBC पर फोकस जरूरी है, क्योंकि संस्थागत पूर्वाग्रह उन्हें अधिक प्रभावित करता है। 2022 में कुल 13,000+ छात्र सुसाइड्स हुए, जो 2013 से 65% बढ़े।
ये आंकड़े दर्शाते हैं कि भेदभाव सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सिस्टेमिक है, जो छात्रों को मानसिक तनाव, डिप्रेशन और आत्महत्या की ओर धकेलता है।
3. पुराने (2012) vs नए (2026) नियम: क्या बदला?
- पुराने नियम (2012): ये नियम अस्तित्व में थे, लेकिन सिर्फ कागज पर। शिकायतकर्ता केवल कॉलेज एडमिनिस्ट्रेशन के पास जा सकता था। एक सदस्य वाली कमेटी निर्णय लेती थी, जो अक्सर संस्थान की साख बचाने के लिए शिकायतों को दबा देती थी। नतीजा: छात्र निराश होकर极端 कदम उठाते थे।
- नए नियम (2026): मुख्य बदलाव कमेटी की संरचना में है। अब कमेटी में कॉलेज एडमिन के अलावा स्टेकहोल्डर्स (छात्र, प्रोफेसर, विशेषज्ञ, सभी वर्गों के प्रतिनिधि) शामिल होंगे। OBC को स्पष्ट रूप से शामिल किया गया, और EWS (Economically Weaker Sections, जिसमें सवर्ण भी आते हैं) को भी कवर किया गया, जो 2012 में नहीं था। कमेटी में फैक्ट-फाइंडिंग टीम होगी, और मॉनिटरिंग सख्त होगी। ये नियम सभी पर लागू हैं, जिसमें धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान या विकलांगता आधारित भेदभाव शामिल है।
4. शिकायत प्रक्रिया: सिविल, न कि क्रिमिनल
ये नियम कोई दंडात्मक कानून नहीं हैं। अगर कोई भेदभाव की शिकायत करता है:
- कमेटी जांच करेगी कि आरोप सही हैं या निराधार।
- आरोपी और शिकायतकर्ता दोनों को नोटिस जारी होगा, और अपना पक्ष रखने का पूरा मौका मिलेगा।
- अगर शुरूआती जांच में झूठा पाया गया, तो शिकायत रिजेक्ट।
- अगर सही साबित हुआ, तो आरोपी को समझाइश दी जाएगी, शपथ-पत्र लिया जाएगा कि दोबारा नहीं होगा।
- अगर फिर भी नहीं माना, तो अधिकतम रस्टिकेशन (निलंबन) का आदेश। कोई जेल या फांसी नहीं।
5. मनुवादी भ्रम और वास्तविकता
सवर्ण समुदाय के कुछ लोग भ्रम फैला रहे हैं कि ये नियम उनके बच्चों को प्रताड़ित करेंगे या फांसी पर लटका देंगे। यह सिर्फ अराजकता फैलाने का प्रयास है, क्योंकि नियम सभी वर्गों पर लागू हैं और सिविल प्रक्रिया पर आधारित हैं। उनका तर्क लॉजिकल नहीं, बल्कि पूर्वाग्रह से प्रेरित है। असल में, ये नियम पेपर पर पड़े पुराने प्रावधानों को सख्ती से लागू करने के लिए हैं, ताकि स्टेकहोल्डर्स की भागीदारी से निष्पक्षता सुनिश्चित हो।
6. निष्कर्ष और श्रद्धांजलि
कुल मिलाकर, UGC के नए नियम उच्च शिक्षा में समानता सुनिश्चित करने का एक प्रयास हैं, जो रोहित वेमुला और पायल तड़वी जैसे मामलों से सीख लेकर बने हैं। ये नियम भेदभाव को रोकेंगे और सभी छात्रों को सुरक्षित माहौल देंगे। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के स्टे के बाद, जरूरी है कि इन्हें और मजबूत बनाया जाए, ताकि सभी वर्गों की चिंताएं दूर हों।
रोहित वेमुला और पायल तड़वी की शहादत को नमन। उन सभी ज्ञात-अज्ञात प्रतिभाओं को श्रद्धांजलि, जिन्होंने संस्थागत अन्याय सहते हुए अपनी जान गंवा दी। 💔।

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