श्री रामधारी दिनकर जी की प्रसिद्ध कविता

कोई अर्थ नहीं — निष्पक्ष पत्रिका
निष्पक्ष पत्रिका
राष्ट्रकवि दिनकर विशेषांक  ◆  वर्ष ७, अंक ३  ◆  जून २०२६  ◆  संपादक : रविंद्र साहू

कोई अर्थ नहीं

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर'


नित जीवन के संघर्षों से
जब टूट चुका हो अन्तर्मन,
तब सुख के मिले समन्दर का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।

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जब फसल सूख कर जल के बिन
तिनका-तिनका बन गिर जाये,
फिर होने वाली वर्षा का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।

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सम्बन्ध कोई भी हों लेकिन
यदि दुःख में साथ न दें अपना,
फिर सुख में उन सम्बन्धों का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।

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छोटी-छोटी खुशियों के क्षण
निकले जाते हैं रोज़ जहाँ,
फिर सुख की नित्य प्रतीक्षा का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।

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मन कटुवाणी से आहत हो
भीतर तक छलनी हो जाये,
फिर बाद कहे प्रिय वचनों का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।

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सुख-साधन चाहे जितने हों
पर काया रोगों का घर हो,
फिर उन अगनित सुविधाओं का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।

⊹ काव्य-तिप्पणी

यह कविता जीवन की उस कटु सच्चाई को स्वर देती है जिसे दिनकर जी ने अपनी ओजस्वी लेखनी से रेखांकित किया — जब संघर्ष में साथ न हो, दुःख में कोई हाथ न थामे, तो बाद में मिलने वाले सुख, सम्बन्ध और साधन निरर्थक हो जाते हैं। समय की सच्चाई यही है कि सहानुभूति का मूल्य उसी क्षण होता है जब वह दी जाये।

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