जीवन की भागदौड़ में खोती मानवता: पैसों की चमक में भूले अपनों का दर्द
नमस्कार दोस्तों,
इंदौर की उस घटना ने सबको हिला दिया
एक घर में बुजुर्ग माता-पिता अकेले रहते थे। पिता की मौत हो गई – 30 दिन बीत गए। फिर मां भी चल बसीं – 20 दिन हो गए। दोनों के शव घर में पड़े रहे, सड़ गए, कीड़े पड़ गए। बदबू फैल गई, लेकिन किसी को खबर नहीं। पड़ोसी या रिश्तेदारों ने भी शायद नोटिस किया, लेकिन कोई आगे नहीं आया। आखिरकार जब पुलिस पहुंची, तो जो नजारा था, वह किसी का भी दिल तोड़ देने वाला था।
और सबसे दुखद बात? उनका बेटा विदेश में बसा हुआ था – अमेरिका में। वहां वह सालाना करोड़ों की कमाई कर रहा था। एक ऐसी नौकरी जहां मीटिंग्स, प्रोजेक्ट्स और डेडलाइंस की भागदौड़ में समय ही नहीं बचता। शायद वह व्यस्त था, शायद फोन पर बात कम हो गई थी, या शायद वह सोचता था कि "घर सब ठीक है"। लेकिन जब हकीकत सामने आई, तो सब कुछ बहुत देर से पता चला।
यह कहानी सिर्फ एक परिवार की नहीं है। यह उन हजारों परिवारों की है जहां बच्चे विदेशों में बस जाते हैं, बड़े पैकेज वाली नौकरियां पकड़ लेते हैं, लेकिन मां-बाप को नौकरों या पड़ोसियों के भरोसे छोड़ देते हैं। क्या इतनी कमाई अपनों की अंतिम विदाई का दर्द कम कर सकती है? क्या करोड़ों रुपये उन शवों को सड़ने से रोक सकते थे?
पैसा सब कुछ नहीं, अपनों का साथ ही असली धन है
दोस्तों, इस घटना से हमें क्या सीख मिलती है? जीवन की भागदौड़ में हम इतने अंधे हो जाते हैं कि मानवीय संवेदनाएं कहीं पीछे छूट जाती हैं। हम बेहतर भविष्य की आस में इस बनावटी दुनिया की ओर दौड़ते हैं – लग्जरी, कारें, बड़े घर, विदेशी ट्रिप्स। लेकिन सच्चाई यही है कि आज तक कोई एक रुपया भी ऊपर लेकर नहीं गया। सब यहीं छूट जाता है – पैसा, पद, संपत्ति। जो बचता है, वो सिर्फ अपनों के साथ बिताए पल, उनकी मुस्कान, उनकी आशीर्वाद।
आइए, आज से बदलाव लाएं
- नियमित संपर्क बनाए रखें – एक छोटा सा कॉल, "मां, आप कैसे हो?" काफी होता है।
- समय निकालें – साल में एक-दो बार घर आना, साथ बैठना, बातें करना।
- देखभाल की व्यवस्था करें – अगर विदेश हैं, तो कोई भरोसेमंद व्यक्ति या सेवा रखें, लेकिन दिल से जुड़े रहें।
- याद रखें – सफलता तभी सच्ची है जब अपनों का दर्द न हो।
जीवन छोटा है। कल का भरोसा नहीं। आज ही अपनों को समय दें, प्यार दें, सम्मान दें। क्योंकि यही मानवता है, यही जीवन की असली सीख है। पैसा कमाएं, लेकिन दिल न खोएं।
आप क्या सोचते हैं? क्या आप भी इस दौड़ में कहीं अपनों को भूल तो नहीं रहे? कमेंट्स में अपनी राय जरूर बताएं।
धन्यवाद,






कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
आपका धन्यवाद आपने हमारे ब्लॉग पर टिप्पणी की